Saturday, September 20, 2025

काशी

नमस्कार,

(विश्वनाथ मंत्र)

महाशक्ति की उपासना का महापर्व नवरात्र और इस पावन अवसर पर मेरा सौभाग्य है की मुझे आपसे संवाद का सौभाग्य मिला


सृष्टि के उन्नयन का आधार आद्यस्वरूप परुष और प्रकृति का संलयन ही है

श्रुति (अर्थात वेद-ब्रह्म), स्मृति और अन्य तथ्यात्मक प्रमाणों में प्रकृति और पुरुष का मूर्त स्वरुप आदि शिव और आदि शक्ति  को ही चेतन स्वरुप मानते हैं. 

भौतिक जड़ में पराभौतिक चेतना के द्वैतवाद का यही आधार मान्य है 


उन्ही शाश्वत शिव की प्रियनगरी काशी की बातें करेंगे आज 


काशी शब्द की उत्पत्ति "काश" धातु से है

काश अर्थात उज्जवल 

काश से ही बना शब्द है प्र-काश जो हम दैनिक जीवन में प्रयोग करते हैं. 

काश अर्थात दीप्त (इल्लुमिनेटिंग)

काशी स्वयं प्रकाशित है.

पृथ्वी की सभी पौराणिक नगरियों सबसे प्राचीन नगरी होने की मान्यता भी काशी को प्राप्त है.




आज की सारी कथाएँ श्रुति स्मृति पुराणोक्त अथवा दन्त प्रचलित रहेंगी. यथासंभव साक्ष्य देने का प्रयास करूँगा. जड़बुद्धि जनित त्रुटियों के लिए अग्रिम क्षमाप्रार्थी हूँ


काशी की उत्पत्ति की अनेक कथाएँ प्रचलित हैं, 

एक जिसमें इसकी सृष्टि स्वयं साम्ब सदाशिव की बुद्धि मणि के प्रकाश से बताई  गई है. 

स्वयं शिव की संरचना होने के कारण यह ब्रम्हा की सृष्टि में नहीं आती 

अतः यहाँ मृत्युलोक के विधान अप्रभावी हैं. 

अतः यहाँ मृत्युलोक के सभी कर्म भी अहैतुक हो जाते हैं. 

यही कारण है की काशी में मृत्यु होने पर आपके अन्य स्थानों पर कृत कर्म भी आपको अकार्मिक बनाकर परम मोक्ष का हेतु बनते हैं.




अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका 

वैशाली द्वारका ध्येय पूरी तक्षशिला गया 


ये ध्येय नगर एकादश में सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में उद्धृत काशी पुरी सर्व मोक्षदायिनी है 

वैराग्य और विरक्ति ही काशी  के रस हैं. 

कलिकाल में जहाँ पतित कर्म वश मतिभ्रंश हो मनुष्य अधोगति को प्राप्त होते हैं वहीँ गोस्वामी जी ने कहा है, " कलियुग एकल नाम आधारा" और एकमात्र नाम जपमात्र  से ही कल्याण का मार्ग बताया है 

वहीं जो अधम अगर नाम भी ना ले सके उन पतितों की भी मुक्ति परम मोक्षदायिनी कशी पुरी में मणिकर्णिका की अग्निस्नान(अंतिम संस्कार ) से हो जाती हैं 


मणिकर्णिका अर्थात उत्तर वाहिनी गंगा के कूल पर वह प्राचीन स्थान जहां आदि शिव ने भी ब्रह्महत्या से जनित क्षोभ से मुक्ति पायी थी.

ऐसी मान्यता है की मणिकर्णिका में जगदम्बा के कर्णफूल गंगा में अलक्षित हो गए थे

यहां की अखंड ज्वाला उन्ही माणिक से दीप्त है.



शिवाख्यान शिवानी के वर्णन के बिना ऐसी है जैसे निष्प्राण शरीर (शव)


सभी ज्योतिर्लिंगों के सामान यहां भी जगदम्बा के दो स्वरुप हैं 


श्री अन्नपूर्णा और श्री विशालाक्षी 


श्री आद्यशंकराचार्य द्वारा पूजित देवी विशालाक्षी  की एक कथानुसार 

देवी सती के "अक्षि" अर्थात नेत्र यहाँ गिरने से ये स्वरुप ५१ शत्तिपीठों में भी उल्लेखित है 


एक अन्य कथा जिसका उल्लेख पूर्व में भी कर चुका हूँ की देवी सती के कर्णफूल यहाँ गिरे और इसी कारणवश इन्हें देवी मणिकर्णिका भी कहते हैं. 


कान्वी देवी कामाक्षी और मतस्य नेत्रा देवी मीनाक्षी के सदृश सुन्दर नेत्रवती देवी विशालाक्षी का माहात्म्य भी श्री आद्यशंकराचार्य ने प्रकाशित किया 


प्रमुख विश्वनाथ मंदिर के समीप यह द्रविड़ मान्यताओं और सांस्कृतिक प्रभावों से युक्त है यह दिव्य मंदिर 




काशी आये, विश्वनाथ के दर्शन किये और जगदम्बा के अन्नपूर्णा स्वरुप का प्रसाद नहीं ग्रहण किया तो आपको यात्रा अधूरी है 

पूरे विश्व के स्वामी विश्वनाथ स्वभाव से विरागी हैं और कामना रहित हैं. 

कहते हैं, जब एकबार शिव ध्यान हेतु जा रहे थे तब जगदम्बा ने उनसे भोजन करके जाने को कहा. विश्वनाथ ने कहा की भोजन तो भौतिक भ्रम और माया का प्रभाव है. अर्थात जठराग्नि एक मानस विकार मात्र है और आभासित है. विश्व में एकमात्र क्षुधा आत्मबोध है बाकी सब मिथ्या है.

प्रभु के वचन सुन अन्नपूर्णा स्वरूपा जगदम्बा को बड़ा रोष हुआ 

महादेव ध्यान में बैठ गए और इधर सम्पूर्ण सृष्टि में भयंकर दुर्भिक्ष हो गया. सृष्टि अन्नविहीन हो गई 

विश्व क्षुधा से पीड़ित होकर त्राहि त्राहि कर बैठा तब महादेव का देवों ने आग्रहपूर्वक ध्यानभंग करवाया 

तब महादेव ने जगदम्बा के रोष को शांत करने हेतु याचक स्वरुप में उनके समक्ष प्र्रस्तुत हुए 

तब अन्नपूर्णा के अन्नदान से सम्पूर्ण सृष्टि में अन्न संचारित हुआ.


काशी की महिमा अनंत है 

वैदिक ऋचाओं और श्रुति स्मृति से यथाबुद्ध ज्ञान से, आज कुछ आपके समक्ष प्रस्तुत होने का दुस्साहस किया. त्रुटियों के लिए पुनः क्षमा प्रार्थी हूँ.


ॐ नमः शिवाय







Tuesday, June 17, 2025

प्राण प्रवाह

हे नित–निर्झर के नीत प्रवाह
अविरल धारा के अविचल कूल,
प्राण वायु के ऊर्ध्व–अधो मध्य
शाश्वत गत हो, आपके चरणों की धूल
- अधोगामी

Saturday, February 5, 2022

स्वर साम्राज्ञी

 हतप्रभ नहीं हूँ क्योंकि परिवर्तन और नश्वरता ही शाश्वत है। 

अप्रत्याशित भी नहीं हुआ कुछ क्योंकि गत 8-10 दिनों में कदाचित मैं एकमात्र ऐसा नहीं होऊंगा जिसके मन में प्रार्थनाओं के स्वरों के नेपथ्य में कहीं एक भय भी अपना विस्तार कर रहा था।


परन्तु ये दुःखद अवश्य है।

अत्यंत दुःखद। हम सभी के लिए। 


एक बालक जिसको उसके पिता ने माँ की अनुपस्थिति में लोरियाँ लता जी के आवाज में सुनायीं थीं और वो बालक उनकी आवाज़ में अपनी माँ को ढूँढता सो जाता था।


एक प्रेमी या प्रेमिका जिसने विरह और मिलन के पलों को उनकी आवाज़ में प्रदर्शित करने का प्रयास किया था


एक हॉस्टल में रहता बालक उनकी आवाज़ में माँ की ममता के गीत सुनकर अपने घर की यादों में खो जाता था।


एक नई बहू जो उनकोली आवाज़ को उतारने का प्रयास करती थी ताकि ससुराल में उसके पहले परिचय को बल मिले।


नई गायिकाओं के लिए जो उनकी आवाज़ में गाने का अपना पहला प्रयास करती थीं और कदाचित कुछ तो सफल स्थापित भी हो पाईं थीं। 


घर की रसोई में अकेले काम करती हुई गृहणी जो शाम को अपने पति के आने पर कोई नया व्यंजन परोसने वाली हो और गुनगुना रही हो, "आज मदहोश हुआ जाए रे"।


और ऐसे अनगिनत लोग जिन्होंने एकबार भी संगीत सुना हो।


मंदिरों में बजती आरतियाँ हों या 15 अगस्त पर "ऐ मेरे वतन के लोगों" को सुनकर भावुक और जवान हुई पीढ़ी।


एक शोक सब तरफ व्याप्त है।


अरे! रविवार को तो हम सरस्वती माँ की प्रतिमा को भी विसर्जित नहीं करते फिर हमारे लिए साक्षात दृश्य सरस्वती स्वरूप लता जी सरस्वती पूजा के अगले दिन, रविवार को कैसे हम से विदा ले सकती हैं। 


रुँधे कंठ से सरस्वती वंदना करते हुए आज माता के8 आरती उतारी। सामने माता की प्रतिमा और मस्तिष्क में लता जी का स्वर गूँज रहा था। आपके पार्थिव शरीर के अवसान के साथ साथ मेरे उस स्वप्न का भी अंत हो गया जिसमें मैंने सोचा था कि कदाचित एक बार आपके चरण स्पर्श का अवसर मिल पाए।


हमारे हर पल, हर क्षण और हर उत्सव को ध्वनि देने वाली स्वर साम्राज्ञी, स्वर की देवी को प्रणाम और श्रद्धांजलि। संगीत ईश्वर की आराधना का स्वरूप है, इसी विश्वास के साथ मुझे आशा है कि ईश्वर आपको परमगति प्रदान करेंगे। 


सादर


29 सि. 1929- 06 फ़. 2022


-राहुल दत्त मिश्र ©

Sunday, September 26, 2021

बेटियाँ

 जग से निराली, पिता के आँखों उजियाली

आँगन की खुशहाली, उपवन की हरियाली।
पपीहे की पीक, कोयल की कूक
शशक सी चंचल, चातक सी हलचल।
भँवरे की गुंजन, स्वर में मल्हार
पिता के जीवन प्रांगण की सदाबहार।
जिनके बिन रूखी, थाली की रोटियाँ
ऐसी प्यारी, सबसे दुलारी, फूलों की क्यारी, होती हैं बेटियाँ

Wednesday, September 1, 2021

मिच्छामि दुःक्खदाम


अर्थात, जाने अनजाने, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अगर मेरे किसी व्यवहार से आपको कष्ट अथवा दुःख हुआ हो तो कृपया मुझे क्षमा करें।


पिछले एक पखवाड़े में मेरे कई जैन और अन्य समुदाय या सम्प्रदाय के लोगों के वॉल पर ये, पोस्ट देखने को मिले।

पर्युषण पर्व के पखवाड़े में सात्विक जीवन एवं विचारों का पालन करते हुए जैन अनुयायी, उत्तम व्यवहार का भी पालन करते हैं और सनातन एवं जैन विचारधाराओं में क्षमा याचना एवं क्षमाशीलता को सर्वोत्तम मानव व्यवहार माना गया है। परंतु दुःख ये होता है कि बिना इसका वास्तविक महत्व जाने, पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया ट्रेंड को फॉलो करते हुए महज सब ये अपने वॉल पर कॉपी पेस्ट या शेयर कर देते हैं।


और पता नहीं बीच में ये अशुद्धि कैसे आ गई, लोग अब जो लिखते हैं वो है, "मिच्छामि दुक्कडम या डुक्कडम"।


बहुत विचारने पर समझ आया कि ये कालांतर में ऐसे हुआ होगा कि हम हिंग्लिश टाइप करते हैं और गूगल कीबोर्ड कहाँ बिचारा दुख और डुख में अंतर जाने। किसी एक ने संभवतः त्रुटि की हो और बाकी सब बस कॉपी पेस्ट में लग गए, जैसा कि सोशल मीडिया की भेड़चाल है।


मित्रों, ये अनुरोध है कि व्यक्त करने से पूर्व अपनी अभव्यक्ति अवश्य परख लें, खास तौर पर जब वो मौलिक न हो। अन्यथा ऐसे ही त्रुटियुक्त ट्रेंड बनेंगे


बाकी अगर किसी की भावना को ठेस पहुची हो तो कृपया

मिच्छामि दुःखदाम


सस्नेह

राहुल दत्त मिश्र

Monday, August 16, 2021

सुभद्रा कुमारी चौहान जयन्ती

 बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी जो, वो हम तक पहुँचानेवाली और देवी रानी लक्ष्मीबाई को हमारे समक्ष साक्षात करने वाली आप ही थीं। मुझे अभी भी 9वीं कक्षा  की हिंदी पुस्तक में आपका चित्र याद है और काफी समय तक झाँसी की रानी की हमारी कल्पना में आप ही मूर्त रहती थीं। 

वीरों के बलिदान को बासंती रंग देने वाली आप एक कवयित्री मात्र नहीं थीं वरन हृदय और व्यक्तित्व से भी एक क्रांतिकारी महिला थीं। 


हिंदी साहित्य में वीर रस की अप्रतिम स्तम्भ और पहली महिला सत्याग्रही को उनके 117वें जन्मदिवस पर शतकोटि नमन

Thursday, March 4, 2021

रेणु जन्मशताब्दी

 'लालपान की बेग़म' की कृपा से आपसे सूक्ष्म साक्षात्कार हुआ। फिर एक दिन, 'पंचलाइट' की रोशनी में 'मैला आँचल'  क्षितिज पर लहराता दिखा। 'एक आदिम रात्रि की महक' महसूस की और कसम से, 'तीसरी कसम' देखते हुए कभी लगा ही नहीं कि आप कोई रचनाकार हो। आप तो जीवन दर्शन का जीवंत स्वरूप प्रतीत होते हो। एकदम से, 'महुआ घटवारिन' जैसी मादकता है आपकी स्याही में। प्रेमचंद जी के बाद किसी से जीवनी मिली हिंदी, आँचलिक साहित्य को तो, वो आपसे।


बाबा नागार्जुन, अज्ञेय, सांस्कृत्यायन जी, निराला और दिनकर जी की पंक्ति में आपको पाता हूँ। जो कुछ भी थोड़ा सीखा, आप सबको पढ़ कर ही सीखा।


जन्मशती पर शत सहस्त्र बार नमन।

4 मार्च 1921-11 अप्रैल 1977

श्री फणीश्वरनाथ जी 'रेणु'