नमस्कार,
(विश्वनाथ मंत्र)
महाशक्ति की उपासना का महापर्व नवरात्र और इस पावन अवसर पर मेरा सौभाग्य है की मुझे आपसे संवाद का सौभाग्य मिला
सृष्टि के उन्नयन का आधार आद्यस्वरूप परुष और प्रकृति का संलयन ही है
श्रुति (अर्थात वेद-ब्रह्म), स्मृति और अन्य तथ्यात्मक प्रमाणों में प्रकृति और पुरुष का मूर्त स्वरुप आदि शिव और आदि शक्ति को ही चेतन स्वरुप मानते हैं.
भौतिक जड़ में पराभौतिक चेतना के द्वैतवाद का यही आधार मान्य है
उन्ही शाश्वत शिव की प्रियनगरी काशी की बातें करेंगे आज
काशी शब्द की उत्पत्ति "काश" धातु से है
काश अर्थात उज्जवल
काश से ही बना शब्द है प्र-काश जो हम दैनिक जीवन में प्रयोग करते हैं.
काश अर्थात दीप्त (इल्लुमिनेटिंग)
काशी स्वयं प्रकाशित है.
पृथ्वी की सभी पौराणिक नगरियों सबसे प्राचीन नगरी होने की मान्यता भी काशी को प्राप्त है.
आज की सारी कथाएँ श्रुति स्मृति पुराणोक्त अथवा दन्त प्रचलित रहेंगी. यथासंभव साक्ष्य देने का प्रयास करूँगा. जड़बुद्धि जनित त्रुटियों के लिए अग्रिम क्षमाप्रार्थी हूँ
काशी की उत्पत्ति की अनेक कथाएँ प्रचलित हैं,
एक जिसमें इसकी सृष्टि स्वयं साम्ब सदाशिव की बुद्धि मणि के प्रकाश से बताई गई है.
स्वयं शिव की संरचना होने के कारण यह ब्रम्हा की सृष्टि में नहीं आती
अतः यहाँ मृत्युलोक के विधान अप्रभावी हैं.
अतः यहाँ मृत्युलोक के सभी कर्म भी अहैतुक हो जाते हैं.
यही कारण है की काशी में मृत्यु होने पर आपके अन्य स्थानों पर कृत कर्म भी आपको अकार्मिक बनाकर परम मोक्ष का हेतु बनते हैं.
अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका
वैशाली द्वारका ध्येय पूरी तक्षशिला गया
ये ध्येय नगर एकादश में सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में उद्धृत काशी पुरी सर्व मोक्षदायिनी है
वैराग्य और विरक्ति ही काशी के रस हैं.
कलिकाल में जहाँ पतित कर्म वश मतिभ्रंश हो मनुष्य अधोगति को प्राप्त होते हैं वहीँ गोस्वामी जी ने कहा है, " कलियुग एकल नाम आधारा" और एकमात्र नाम जपमात्र से ही कल्याण का मार्ग बताया है
वहीं जो अधम अगर नाम भी ना ले सके उन पतितों की भी मुक्ति परम मोक्षदायिनी कशी पुरी में मणिकर्णिका की अग्निस्नान(अंतिम संस्कार ) से हो जाती हैं
मणिकर्णिका अर्थात उत्तर वाहिनी गंगा के कूल पर वह प्राचीन स्थान जहां आदि शिव ने भी ब्रह्महत्या से जनित क्षोभ से मुक्ति पायी थी.
ऐसी मान्यता है की मणिकर्णिका में जगदम्बा के कर्णफूल गंगा में अलक्षित हो गए थे
यहां की अखंड ज्वाला उन्ही माणिक से दीप्त है.
शिवाख्यान शिवानी के वर्णन के बिना ऐसी है जैसे निष्प्राण शरीर (शव)
सभी ज्योतिर्लिंगों के सामान यहां भी जगदम्बा के दो स्वरुप हैं
श्री अन्नपूर्णा और श्री विशालाक्षी
श्री आद्यशंकराचार्य द्वारा पूजित देवी विशालाक्षी की एक कथानुसार
देवी सती के "अक्षि" अर्थात नेत्र यहाँ गिरने से ये स्वरुप ५१ शत्तिपीठों में भी उल्लेखित है
एक अन्य कथा जिसका उल्लेख पूर्व में भी कर चुका हूँ की देवी सती के कर्णफूल यहाँ गिरे और इसी कारणवश इन्हें देवी मणिकर्णिका भी कहते हैं.
कान्वी देवी कामाक्षी और मतस्य नेत्रा देवी मीनाक्षी के सदृश सुन्दर नेत्रवती देवी विशालाक्षी का माहात्म्य भी श्री आद्यशंकराचार्य ने प्रकाशित किया
प्रमुख विश्वनाथ मंदिर के समीप यह द्रविड़ मान्यताओं और सांस्कृतिक प्रभावों से युक्त है यह दिव्य मंदिर
काशी आये, विश्वनाथ के दर्शन किये और जगदम्बा के अन्नपूर्णा स्वरुप का प्रसाद नहीं ग्रहण किया तो आपको यात्रा अधूरी है
पूरे विश्व के स्वामी विश्वनाथ स्वभाव से विरागी हैं और कामना रहित हैं.
कहते हैं, जब एकबार शिव ध्यान हेतु जा रहे थे तब जगदम्बा ने उनसे भोजन करके जाने को कहा. विश्वनाथ ने कहा की भोजन तो भौतिक भ्रम और माया का प्रभाव है. अर्थात जठराग्नि एक मानस विकार मात्र है और आभासित है. विश्व में एकमात्र क्षुधा आत्मबोध है बाकी सब मिथ्या है.
प्रभु के वचन सुन अन्नपूर्णा स्वरूपा जगदम्बा को बड़ा रोष हुआ
महादेव ध्यान में बैठ गए और इधर सम्पूर्ण सृष्टि में भयंकर दुर्भिक्ष हो गया. सृष्टि अन्नविहीन हो गई
विश्व क्षुधा से पीड़ित होकर त्राहि त्राहि कर बैठा तब महादेव का देवों ने आग्रहपूर्वक ध्यानभंग करवाया
तब महादेव ने जगदम्बा के रोष को शांत करने हेतु याचक स्वरुप में उनके समक्ष प्र्रस्तुत हुए
तब अन्नपूर्णा के अन्नदान से सम्पूर्ण सृष्टि में अन्न संचारित हुआ.
काशी की महिमा अनंत है
वैदिक ऋचाओं और श्रुति स्मृति से यथाबुद्ध ज्ञान से, आज कुछ आपके समक्ष प्रस्तुत होने का दुस्साहस किया. त्रुटियों के लिए पुनः क्षमा प्रार्थी हूँ.
ॐ नमः शिवाय