Saturday, September 20, 2025

काशी

नमस्कार,

(विश्वनाथ मंत्र)

महाशक्ति की उपासना का महापर्व नवरात्र और इस पावन अवसर पर मेरा सौभाग्य है की मुझे आपसे संवाद का सौभाग्य मिला


सृष्टि के उन्नयन का आधार आद्यस्वरूप परुष और प्रकृति का संलयन ही है

श्रुति (अर्थात वेद-ब्रह्म), स्मृति और अन्य तथ्यात्मक प्रमाणों में प्रकृति और पुरुष का मूर्त स्वरुप आदि शिव और आदि शक्ति  को ही चेतन स्वरुप मानते हैं. 

भौतिक जड़ में पराभौतिक चेतना के द्वैतवाद का यही आधार मान्य है 


उन्ही शाश्वत शिव की प्रियनगरी काशी की बातें करेंगे आज 


काशी शब्द की उत्पत्ति "काश" धातु से है

काश अर्थात उज्जवल 

काश से ही बना शब्द है प्र-काश जो हम दैनिक जीवन में प्रयोग करते हैं. 

काश अर्थात दीप्त (इल्लुमिनेटिंग)

काशी स्वयं प्रकाशित है.

पृथ्वी की सभी पौराणिक नगरियों सबसे प्राचीन नगरी होने की मान्यता भी काशी को प्राप्त है.




आज की सारी कथाएँ श्रुति स्मृति पुराणोक्त अथवा दन्त प्रचलित रहेंगी. यथासंभव साक्ष्य देने का प्रयास करूँगा. जड़बुद्धि जनित त्रुटियों के लिए अग्रिम क्षमाप्रार्थी हूँ


काशी की उत्पत्ति की अनेक कथाएँ प्रचलित हैं, 

एक जिसमें इसकी सृष्टि स्वयं साम्ब सदाशिव की बुद्धि मणि के प्रकाश से बताई  गई है. 

स्वयं शिव की संरचना होने के कारण यह ब्रम्हा की सृष्टि में नहीं आती 

अतः यहाँ मृत्युलोक के विधान अप्रभावी हैं. 

अतः यहाँ मृत्युलोक के सभी कर्म भी अहैतुक हो जाते हैं. 

यही कारण है की काशी में मृत्यु होने पर आपके अन्य स्थानों पर कृत कर्म भी आपको अकार्मिक बनाकर परम मोक्ष का हेतु बनते हैं.




अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका 

वैशाली द्वारका ध्येय पूरी तक्षशिला गया 


ये ध्येय नगर एकादश में सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में उद्धृत काशी पुरी सर्व मोक्षदायिनी है 

वैराग्य और विरक्ति ही काशी  के रस हैं. 

कलिकाल में जहाँ पतित कर्म वश मतिभ्रंश हो मनुष्य अधोगति को प्राप्त होते हैं वहीँ गोस्वामी जी ने कहा है, " कलियुग एकल नाम आधारा" और एकमात्र नाम जपमात्र  से ही कल्याण का मार्ग बताया है 

वहीं जो अधम अगर नाम भी ना ले सके उन पतितों की भी मुक्ति परम मोक्षदायिनी कशी पुरी में मणिकर्णिका की अग्निस्नान(अंतिम संस्कार ) से हो जाती हैं 


मणिकर्णिका अर्थात उत्तर वाहिनी गंगा के कूल पर वह प्राचीन स्थान जहां आदि शिव ने भी ब्रह्महत्या से जनित क्षोभ से मुक्ति पायी थी.

ऐसी मान्यता है की मणिकर्णिका में जगदम्बा के कर्णफूल गंगा में अलक्षित हो गए थे

यहां की अखंड ज्वाला उन्ही माणिक से दीप्त है.



शिवाख्यान शिवानी के वर्णन के बिना ऐसी है जैसे निष्प्राण शरीर (शव)


सभी ज्योतिर्लिंगों के सामान यहां भी जगदम्बा के दो स्वरुप हैं 


श्री अन्नपूर्णा और श्री विशालाक्षी 


श्री आद्यशंकराचार्य द्वारा पूजित देवी विशालाक्षी  की एक कथानुसार 

देवी सती के "अक्षि" अर्थात नेत्र यहाँ गिरने से ये स्वरुप ५१ शत्तिपीठों में भी उल्लेखित है 


एक अन्य कथा जिसका उल्लेख पूर्व में भी कर चुका हूँ की देवी सती के कर्णफूल यहाँ गिरे और इसी कारणवश इन्हें देवी मणिकर्णिका भी कहते हैं. 


कान्वी देवी कामाक्षी और मतस्य नेत्रा देवी मीनाक्षी के सदृश सुन्दर नेत्रवती देवी विशालाक्षी का माहात्म्य भी श्री आद्यशंकराचार्य ने प्रकाशित किया 


प्रमुख विश्वनाथ मंदिर के समीप यह द्रविड़ मान्यताओं और सांस्कृतिक प्रभावों से युक्त है यह दिव्य मंदिर 




काशी आये, विश्वनाथ के दर्शन किये और जगदम्बा के अन्नपूर्णा स्वरुप का प्रसाद नहीं ग्रहण किया तो आपको यात्रा अधूरी है 

पूरे विश्व के स्वामी विश्वनाथ स्वभाव से विरागी हैं और कामना रहित हैं. 

कहते हैं, जब एकबार शिव ध्यान हेतु जा रहे थे तब जगदम्बा ने उनसे भोजन करके जाने को कहा. विश्वनाथ ने कहा की भोजन तो भौतिक भ्रम और माया का प्रभाव है. अर्थात जठराग्नि एक मानस विकार मात्र है और आभासित है. विश्व में एकमात्र क्षुधा आत्मबोध है बाकी सब मिथ्या है.

प्रभु के वचन सुन अन्नपूर्णा स्वरूपा जगदम्बा को बड़ा रोष हुआ 

महादेव ध्यान में बैठ गए और इधर सम्पूर्ण सृष्टि में भयंकर दुर्भिक्ष हो गया. सृष्टि अन्नविहीन हो गई 

विश्व क्षुधा से पीड़ित होकर त्राहि त्राहि कर बैठा तब महादेव का देवों ने आग्रहपूर्वक ध्यानभंग करवाया 

तब महादेव ने जगदम्बा के रोष को शांत करने हेतु याचक स्वरुप में उनके समक्ष प्र्रस्तुत हुए 

तब अन्नपूर्णा के अन्नदान से सम्पूर्ण सृष्टि में अन्न संचारित हुआ.


काशी की महिमा अनंत है 

वैदिक ऋचाओं और श्रुति स्मृति से यथाबुद्ध ज्ञान से, आज कुछ आपके समक्ष प्रस्तुत होने का दुस्साहस किया. त्रुटियों के लिए पुनः क्षमा प्रार्थी हूँ.


ॐ नमः शिवाय







Tuesday, June 17, 2025

प्राण प्रवाह

हे नित–निर्झर के नीत प्रवाह
अविरल धारा के अविचल कूल,
प्राण वायु के ऊर्ध्व–अधो मध्य
शाश्वत गत हो, आपके चरणों की धूल
- अधोगामी

Saturday, February 5, 2022

स्वर साम्राज्ञी

 हतप्रभ नहीं हूँ क्योंकि परिवर्तन और नश्वरता ही शाश्वत है। 

अप्रत्याशित भी नहीं हुआ कुछ क्योंकि गत 8-10 दिनों में कदाचित मैं एकमात्र ऐसा नहीं होऊंगा जिसके मन में प्रार्थनाओं के स्वरों के नेपथ्य में कहीं एक भय भी अपना विस्तार कर रहा था।


परन्तु ये दुःखद अवश्य है।

अत्यंत दुःखद। हम सभी के लिए। 


एक बालक जिसको उसके पिता ने माँ की अनुपस्थिति में लोरियाँ लता जी के आवाज में सुनायीं थीं और वो बालक उनकी आवाज़ में अपनी माँ को ढूँढता सो जाता था।


एक प्रेमी या प्रेमिका जिसने विरह और मिलन के पलों को उनकी आवाज़ में प्रदर्शित करने का प्रयास किया था


एक हॉस्टल में रहता बालक उनकी आवाज़ में माँ की ममता के गीत सुनकर अपने घर की यादों में खो जाता था।


एक नई बहू जो उनकोली आवाज़ को उतारने का प्रयास करती थी ताकि ससुराल में उसके पहले परिचय को बल मिले।


नई गायिकाओं के लिए जो उनकी आवाज़ में गाने का अपना पहला प्रयास करती थीं और कदाचित कुछ तो सफल स्थापित भी हो पाईं थीं। 


घर की रसोई में अकेले काम करती हुई गृहणी जो शाम को अपने पति के आने पर कोई नया व्यंजन परोसने वाली हो और गुनगुना रही हो, "आज मदहोश हुआ जाए रे"।


और ऐसे अनगिनत लोग जिन्होंने एकबार भी संगीत सुना हो।


मंदिरों में बजती आरतियाँ हों या 15 अगस्त पर "ऐ मेरे वतन के लोगों" को सुनकर भावुक और जवान हुई पीढ़ी।


एक शोक सब तरफ व्याप्त है।


अरे! रविवार को तो हम सरस्वती माँ की प्रतिमा को भी विसर्जित नहीं करते फिर हमारे लिए साक्षात दृश्य सरस्वती स्वरूप लता जी सरस्वती पूजा के अगले दिन, रविवार को कैसे हम से विदा ले सकती हैं। 


रुँधे कंठ से सरस्वती वंदना करते हुए आज माता के8 आरती उतारी। सामने माता की प्रतिमा और मस्तिष्क में लता जी का स्वर गूँज रहा था। आपके पार्थिव शरीर के अवसान के साथ साथ मेरे उस स्वप्न का भी अंत हो गया जिसमें मैंने सोचा था कि कदाचित एक बार आपके चरण स्पर्श का अवसर मिल पाए।


हमारे हर पल, हर क्षण और हर उत्सव को ध्वनि देने वाली स्वर साम्राज्ञी, स्वर की देवी को प्रणाम और श्रद्धांजलि। संगीत ईश्वर की आराधना का स्वरूप है, इसी विश्वास के साथ मुझे आशा है कि ईश्वर आपको परमगति प्रदान करेंगे। 


सादर


29 सि. 1929- 06 फ़. 2022


-राहुल दत्त मिश्र ©

Sunday, September 26, 2021

बेटियाँ

 जग से निराली, पिता के आँखों उजियाली

आँगन की खुशहाली, उपवन की हरियाली।
पपीहे की पीक, कोयल की कूक
शशक सी चंचल, चातक सी हलचल।
भँवरे की गुंजन, स्वर में मल्हार
पिता के जीवन प्रांगण की सदाबहार।
जिनके बिन रूखी, थाली की रोटियाँ
ऐसी प्यारी, सबसे दुलारी, फूलों की क्यारी, होती हैं बेटियाँ

Wednesday, September 1, 2021

मिच्छामि दुःक्खदाम


अर्थात, जाने अनजाने, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अगर मेरे किसी व्यवहार से आपको कष्ट अथवा दुःख हुआ हो तो कृपया मुझे क्षमा करें।


पिछले एक पखवाड़े में मेरे कई जैन और अन्य समुदाय या सम्प्रदाय के लोगों के वॉल पर ये, पोस्ट देखने को मिले।

पर्युषण पर्व के पखवाड़े में सात्विक जीवन एवं विचारों का पालन करते हुए जैन अनुयायी, उत्तम व्यवहार का भी पालन करते हैं और सनातन एवं जैन विचारधाराओं में क्षमा याचना एवं क्षमाशीलता को सर्वोत्तम मानव व्यवहार माना गया है। परंतु दुःख ये होता है कि बिना इसका वास्तविक महत्व जाने, पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया ट्रेंड को फॉलो करते हुए महज सब ये अपने वॉल पर कॉपी पेस्ट या शेयर कर देते हैं।


और पता नहीं बीच में ये अशुद्धि कैसे आ गई, लोग अब जो लिखते हैं वो है, "मिच्छामि दुक्कडम या डुक्कडम"।


बहुत विचारने पर समझ आया कि ये कालांतर में ऐसे हुआ होगा कि हम हिंग्लिश टाइप करते हैं और गूगल कीबोर्ड कहाँ बिचारा दुख और डुख में अंतर जाने। किसी एक ने संभवतः त्रुटि की हो और बाकी सब बस कॉपी पेस्ट में लग गए, जैसा कि सोशल मीडिया की भेड़चाल है।


मित्रों, ये अनुरोध है कि व्यक्त करने से पूर्व अपनी अभव्यक्ति अवश्य परख लें, खास तौर पर जब वो मौलिक न हो। अन्यथा ऐसे ही त्रुटियुक्त ट्रेंड बनेंगे


बाकी अगर किसी की भावना को ठेस पहुची हो तो कृपया

मिच्छामि दुःखदाम


सस्नेह

राहुल दत्त मिश्र

Monday, August 16, 2021

सुभद्रा कुमारी चौहान जयन्ती

 बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी जो, वो हम तक पहुँचानेवाली और देवी रानी लक्ष्मीबाई को हमारे समक्ष साक्षात करने वाली आप ही थीं। मुझे अभी भी 9वीं कक्षा  की हिंदी पुस्तक में आपका चित्र याद है और काफी समय तक झाँसी की रानी की हमारी कल्पना में आप ही मूर्त रहती थीं। 

वीरों के बलिदान को बासंती रंग देने वाली आप एक कवयित्री मात्र नहीं थीं वरन हृदय और व्यक्तित्व से भी एक क्रांतिकारी महिला थीं। 


हिंदी साहित्य में वीर रस की अप्रतिम स्तम्भ और पहली महिला सत्याग्रही को उनके 117वें जन्मदिवस पर शतकोटि नमन

Thursday, March 4, 2021

रेणु जन्मशताब्दी

 'लालपान की बेग़म' की कृपा से आपसे सूक्ष्म साक्षात्कार हुआ। फिर एक दिन, 'पंचलाइट' की रोशनी में 'मैला आँचल'  क्षितिज पर लहराता दिखा। 'एक आदिम रात्रि की महक' महसूस की और कसम से, 'तीसरी कसम' देखते हुए कभी लगा ही नहीं कि आप कोई रचनाकार हो। आप तो जीवन दर्शन का जीवंत स्वरूप प्रतीत होते हो। एकदम से, 'महुआ घटवारिन' जैसी मादकता है आपकी स्याही में। प्रेमचंद जी के बाद किसी से जीवनी मिली हिंदी, आँचलिक साहित्य को तो, वो आपसे।


बाबा नागार्जुन, अज्ञेय, सांस्कृत्यायन जी, निराला और दिनकर जी की पंक्ति में आपको पाता हूँ। जो कुछ भी थोड़ा सीखा, आप सबको पढ़ कर ही सीखा।


जन्मशती पर शत सहस्त्र बार नमन।

4 मार्च 1921-11 अप्रैल 1977

श्री फणीश्वरनाथ जी 'रेणु'

Sunday, August 2, 2020

साकार

घनी, अंधियारी निशा, जैसे तेरे केश,
स्वच्छ, रैखिक आकाशगंगा सम मांग,
मध्य निर्भीक धवल चंद्र, सम मुख
और चंद्र की उभारों के समान तेरे नाक- नक्श।

सुना था कोई लाल परी, चरखा काटती,
बैठी है चंद्र की कहानियों में,
तेरे अधरों की लाली, उसी का
आभास दिलाती है, विचारों में!

गिरें पलकें, सावन के मेघ घुमड़ते हुए,
दौड़े आते हों, पृथ्वी को अपनी आग़ोश में लेने
और उठें, तो जैसे स्वच्छ चाँदनी
फैली ही चारो ओर नील- सरोवर के।

मेरे मन का तूफ़ान, तेरी सांसो
के उतार चढ़ाव में झलके
जब मैं आऊँ तेरे पास और
संकोचवश जब तू, बंद कर ले पलकें।

तेरा चाँदी सा रंग, हो जाए गुलाबों सा
मुख हो जाए सघन रक्त
ज्यों सूर्य की प्रथम किरण
हिमालय के हिम् पर हो गई हो आसक्त।

इतना भी नहीं ज्ञात इस अज्ञानी को
की तेरे इस अप्रतिम सौंदर्य की सीमा क्या है,
मैं तो जब भी तेरे सन्मुख होता हूँ
मानो लगता है कि हर पलक के साथ
तेरा चेहरा एकदम नया है

मुझ मूढ़ को तो प्रेम की परिभाषा
तक का ज्ञान नहीं
मैं क्या करूँगा तेरे इस दैवीय सौंदर्य की उपासना
मुझे तो इन जड़-भौतिक संरचनाओं
की भक्ति तक का ज्ञान नहीं।

तुम यथार्थतः ही एक जीवंत चमत्कार हो
ईश्वर की परिकल्पना उन्हें साकारती है
तुम तो स्वयं ही इस निःसार जगत में
एकमात्र स्वतः साकार हो।

Wednesday, September 25, 2019

कर्ज़ की ये जिंदगी




कर्ज़ से भरी, कर्ज़ की ये जिंदगी,
मैं बस यूं ही जीता चला गया,
लोग आते गए, रिश्ते जुड़ते गए
और कारवाँ सा बनता चला गया।
जो भी मिला यहाँ, ये ही कहता था वो,
मेरी ज़िंदगी पर उसका, कर्ज़ है जो!
चुकाना पड़ेगा मुझे एक दिन
और में....
उन सभी का कर्ज चुकाता चला गया।
कुछ हमदर्द भी मिले यहाँ,
कहते कि, इतने कर्ज़ में भी मेरी जाँ,
बचत इतनी कैसे कर पाते हो तुम
कि, इतने दुखों में भी, कैसे मुस्कुराते हो तुम।
मैंने हँसकर कहा उनसे, यूँ ही सदा,
हँसी महज़ नहीं, बचत की एक निशाँ!
कमाई नहीं हैं हमने खुशियाँ इतनी,
पर हम ले आते हैं फिर से,
कर्ज़ की ये हँसी।
किसी ने ना बताया, कब दिया इतना कर्ज़,
बस करते रहे हमसे तगादे का अर्ज़,
हमने भी नहीं कि कभी जानने की ये कोशिश
बस चुकाते ही रह गए, सबके हिस्से का कर्ज।
ले कर ये उधार की हंसी, हम मुस्कुराते रहे,
और उसी उधार से, कर्ज़ चुकाते रहे,
लेकर सभी के आंखों के आँसू,
मैं सबके लबों पर हंसी देता चला गया,
मेरी ज़िंदगी पर था जाने कितना कर्ज़!
बस मैं सभी का कर्ज चुकाता चला गया
इस उम्मीद में, कि अगली ज़िन्दगी जियूँगा अपनी
मैं बस यूँ ही कर्ज़ में जीता चला गया।

Saturday, January 26, 2019

कृष्णा सोबती.....स्मरिका

कल और परसों थोड़ा व्यस्त था। पर विश्वास करें  टी वी पर समाचार जरूर देखा था। गूगल पर भी देखा। कोई सुगबुगाहट तक नहीं देखी। शायद बहुतों को तो नाम भी पता ना हो(कथित, हिंदी के आधुनिक प्रवर्तकों को)।

एक और महान लेखनी की स्याही खत्म हो गई। एक और कविता पर पूर्णविराम लग गया। "अंधेरे की सूरजमुखी" मुरझा गई।"तीन पहाड़" मौन हैं। न जाने, "मुक्तिबोध" पुनः हो न हो। सोबती जी नहीं रहीं। और दो दिन बाद यह समाचार जान पाया। बहुत दुख हुआ।

शायद कोई छोटा सा यू ट्यूबर, अदना सा तुकबंदीबाज़ भी जाता है तो सुर्खियों में रहता है। आज ज्ञानपीठ पुरस्कृत, भारतीय भाषा साहित्य की गंगा जमुनी तहजीब  की एक धारा ऐसे चुप चाप चली गईं। बड़ा दुःखद है, भारतीय साहित्य का ऐसा अवसान।

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।

राहुल दत्त

कृष्णा सोबती (१८ फ़रवरी १९२५- २५ जनवरी २०१९ )

Thursday, January 10, 2019

स्व. श्री रविन्द्र कालिया की पुण्यतिथि पर

स्मृति से
2016-
सुबह सुबह अखबार के पहले पन्ने पर चार पंक्तियों का एक समाचार देखा। हृदय कचोट गया पढ़ कर। श्री रविन्द्र कालिया नहीं रहे। मृत्यु एक अवांछित नियति है पर हृदय के कचोटने का कारण वस्तुतः कुछ और ही था। हिंदी के इतने बड़े सुप्रसिद्ध कहानीकार और भारतीय ज्ञानपीठ के प्रमुख रहे व्यक्ति के निधन का हिंदी मीडिया में इतना छोटा उल्लेख। जहां आज हिंदी मीडिया का नेतृत्व करनेवाले टी वी चैनल और अखबार में त्रुटियों की भरमार होती है, उन भाषा के कथित ठेकेदारों से और अपेक्षा भी क्या है। आज हिंदी भाषा और साहित्य के निम्नतर स्तर पर आने का कारण भी यही है। आज की पीढ़ी हिंदी बोलना भी हीन समझती है और जो चाहते हैं उन्हें शुद्ध हिंदी भाषा का ज्ञान ही नहीं।

जबसे हिंदी साहित्य से जुड़ा, वागर्थ(हिंदी मासिक), ने बड़ा मार्गदर्शन किया। मेरे लिए तो ज्ञानपीठ का पर्याय उस समय श्री कालिया ही थे। नौ साल छोटी पत्नी, और ऐसी न जाने कितनी ही पुस्तकें और कथाएं। श्री कालिया एक लेखक ही नहीं, एक संयोजक भी थे।

मेरा नमन् उनको। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे।

श्री रविन्द्र कालिया(1-4-1939 से 9-1- 2016)

Tuesday, December 11, 2018

मेरी कहानी

आज खुद से मिला. अजीब सा तार तार. सोचा मुठ्ठियों में समेट लूँ पर मैं था जो उंगलियों की दरारों से निकलता गया. जब तक संवार के एक जगह बनाई, तब तक पूरा ऊड चुका था, क्यूं? फिर याद आया की, यूं टुकड़ों में इस तरह निकल गया क्यूंकि मैने कई इच्छाएं बना ली थी. जैसे एक भक्त के 33 करोड़ भगवान होते हैं. फिर सोचा की एक भगवान चुन लूँ और साधना करूं। पर भगवान तो भगवान ठहरे। अब क्या करें? योग और साध् भी अहैतुक हैं। सोचता हूँ आत्म-बलिदान को, पर भक्ति के मार्ग में प्रेम होता है, भक्ति अनश्वरता है, नाश के ओर कैसे उन्मुख हो जाऊँ? ज्ञात नहीं पर निरंतरता कहीं विलुप्त हो गई है। 

चुप-चाप आँखें बंद कर लीं और लेट गया। दिल में अजीब सी उथल पुथल हो रही थी। लगता था भावनाओं के सागर में विचारों का तूफान मचा था और इन विचारों ने मंथन का ऐसा भंवर तैयार कर दिया था की बस मेरा अस्तित्व उसी में समाहित होता सा लग रहा था।
आँखों के गिर्द बस दृश्यों का ऐसा जाल सा बिछा था जैसे की दिमाग में पहुचने की हर दृश्य को जल्दी हो। पर मन को थोड़ा काबू किया और ध्यान केन्द्रित करने पर एक-एक करके सारे दृश्य क्रमवार आने लगे थे।

Sunday, July 31, 2016

मुंशी प्रेमचंद जयंती

पहली बार जब हामिद से मिला तो बहुत छोटा था। चिमटा खरीदने की गहराई नहीं समझ सका। फिर एक के बाद एक, कई बार, बार बार उससे मिलता रहा। फिर जब होरी राम, हरखू और जबरा से आठवीं कक्षा में भेंट हुई तब हामिद की ज़रूरतपरस्ती और समझ का एहसास हुआ। तब मुंशी जी के क़लम का असली रंग समझ पाया। उन्ही दिनों गाँव के ठाकुर के कुँए से एक लोटा पानी निकालने की कठिनता भी समझी। क्या लेखनी थी। कितनी सरलता थी। भाषा इतनी सुन्दर और सहज कि आपको पंक्तियाँ दृश्यवत् आपकी आँखों के सामने घटित होती प्रतीत होंगी, और कब आप जबरा की गंध खुद भी महसूस करने लगेंगे, ये पता भी नहीं चलेगा।

इतना पढने के बाद भी, ये सोचता हूँ कि काश और लिखते मुंशी जी। आज दस पंद्रह छोटी मोटी कहानियां और पंद्रह बीस कविताएं लिख कर अपनी पुस्तक छपवा कर, अपनी सामाजिक और राजनयिक पैठ के जरिये रॉयल्टी खाने और करियर सेट कर लेने वाले लोग, मुंशी जी के संघर्ष, गरीबी और भूख जनित वास्तविक कथाकारिता कहाँ से सीखेंगे। उन्हें लेखनी की कृत्रिमता के एल इ डी रोशनी में डूबे हुए रहने की आदत है। जीवन के घरोंदे में वास्तविकता के द्वारों और वातायनों को खोल कर जीवन दर्शन के प्राकृतिक सौंदर्य से साक्षात्कार कैसे हो। बस यही अंतर है प्रेमचंद और आजकल के रचनाकारों में....

इश्वर के भी दस बार अवतार हुए परंतु संभवतः अब ऐसी कालजयी रचनात्मकता का पुनरावतरन्, अब ना हो पाये।

मुंशी जी को शत्-शत् नमन्

Saturday, October 18, 2014

तुम्हारा मोह

जब था मैं,
एकाकी,
चहुँ ओर घिरा
तमान्ध
एकांत से,
जल रहा
कटु उपेक्षा के 
धूप में,
आई तुम 
जीवन में,
आशा ज्योत
लिये कर में,
छा गई छाया,
छू गई माया,

दे गई शीतलता,
तुम्हारी नेह-छोह।

अब मैं हूँ,
मण्डित 
सद्यः आभाओं से,
मित्रता, प्रेम,
संबंधों और 
आशाओं से,
अब जब तुम 
कह रही हो,
अथवा 
संकेत 
दे रही हो,
कि,
अवसान है,
इस राग का,
हमारा तुम्हारा
देख लूँ मैं,
कोई और सहारा, 
जब मुझे अब 
हो चुकी है,
तुम्हारी लत
भावना उद्यत,
तब ही तुम 
जा रहे हो,
क्यूं ऐसे 
बतला रहे हो,
खींचती है 
मुझे अज्ञात 
शक्ति अथवा,
तुम्हारी ओर 
कदाचित 
तुम्हारा मोह।


ज्ञात है मुझे,
अतुलित असह्य 
यह सत्य 
कि
यही है 
नियम सृष्टि का,
प्रलय ही है 
लक्ष्य
अतिवृष्टि का 
और 
अंत है इस मिलन का 

क्रूर 
अमानवीय 
अदैव बिछोह,


मानस पटल में, 
गहन झंझा है 
आशा दिवस की,
यही संझा है,
परंतु पुनः,
क्यूं, 
है यह आभासित,
मानस-पटल पर,
है हो रहा कुछ उदित,
और सुनाई देती है,
दुंदुभी,
अथवा है यह,
कोई रणभेरी,
कैसा छिड़ा है 
अंतःकरण में,
मेरे यह विद्रोह।

अथवा,
यह है कोई 
युद्ध,
मेरा मन है,
स्व-विचारों से
बिद्ध,
अज्ञात है यह,
मुझे अनूठा 
कि, है यह 
मेरे 
मस्तिष्क औ 
मन का 
मुझसे कोई द्रोह।


अथवा,
यह है 
किसी पथिक की,
अथवा 
किसी थके श्रमिक की,
सही पथ 
अथवा
नवीन जीविका की 
टोह,

अथवा,
तुम्हारा मोह।

Sunday, May 1, 2011

Tumhari Hansi

तुम्हारी हंसी,

खिलते फूलों सी नाज़ुक तुम्हारी हंसी,
कितनी प्यारी लगती है, प्यारी तुम्हारी हंसी
सवेरे की किरणों सी निश्च्छल है ये,
चाँदनी से भी मादक तुम्हारी हंसी
बिजलियों जैसी चमकीली भड़कीली है ये,
चूड़ियों सी खन खन  तुम्हारी हंसी
निगाहें तो घायल करती मगर,
लूट लेती दिलों को तुम्हारी हंसी

तमन्ना है यूँ ही तुम हंसती रहो
देखते ही रहे हम तुम्हारी हंसी.


मित्रों ये मेरी  एक प्रिय कविता है जो किसी अज्ञात कवि की है.


Tuesday, January 20, 2009

संचार

मित्रों अब मैं अपनी दोहरी मनःस्थिति से आपको अवगत कराना चाहता हूँ जिससे मैं कुछ महीनों पूर्व बड़ा आहात हुआ एवं एक सुखद अनुभूति के अंत तक पहुँचा।

किंचित, जीवन का है
बस येही स्वरुप,
की, एक पल को छाँव,
तो, वर्षों की धूप।


अगणित वर्षों की
सहकर तृष्णा,
घोर व्यथा,
विकल वियोग
मन की क्लान्तता,
विषय का राग,
सोया नहीं मैं,
पलभर भी,
इन कोटि पलों में
आलंभन ले,
स्मृतियों की,
मस्तिष्क की
विस्मृति
और आंखों में आग
बस ..........

लिया ये निर्णय,
नहीं करुँ अब
मोह कहीं मैं।
पर, पुनः ..........
एक पल में
छा गई यूँ
हरीतिमा,
सूखे छिउले से भी
उड़ गए नीलकंठ।
फूट पडी कोपलें,
फाड़ के
धरती का कोख,

आ गई पुनः,
राग,
लगता था की,
अंत हुआ,
एक सदी का,
की, एक अमोघ रात्रि का,
चह चहा उठे
स्वप्नखग,

और उनके कलरव से,
या की,
आशोदय से
बस, ऐसा की मैं,
चिरकालीन
गहन निद्रा से
अकस्मात ही,
गया हूँ जाग।

मित्रों मुझे बताएं की कैसी लगी ये कविता आपको.

Saturday, December 27, 2008

मैं

मित्रों, यह प्रश्न मेरे मस्तिष्क में हमेशा घूमता रहता है की मैं कौन हूँ? क्या उद्देश्य है मेरा? बस इसी को शब्दों में पिरो कर आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मैं तो एक आवाज़ हूँ,
शब्द हीन,संज्ञा हीन सा,
एक चीख की तरह,
जिसमें,
होता है समावेश,
विभिन्न भावों का,
हर्ष, विस्मय
विषाद, एवं हुंकार का,
परन्तु नहीं होती कोई
अभिव्यक्ति।

मैं तो एक संगीत हूँ,
प्रथामहीन, अंतराहीन
एक आलाप के सुर की तरह,
जिसमें,
होता है समावेश सप्त स्वरों का,
सा रे गा मा से
पुनः 'सा' तक
परन्तु नहीं होता कोई भी
व्यंजन।
मैं एक अंतहीन आकाश हूँ,
प्रकाश हीन, अस्पर्शी
एक व्यापक निर्वात सा
जिसमें है समावेश
विभिन्न आकाश गंगाओं का,
ग्रह- नक्षत्र एवं तारों की जगमग का
परन्तु नहीं होता कोई आपना प्रकाश
बस दृश्य हूँ, परावर्तित किरणों से।

मैं तो एक प्रकाश हूँ,
निरा श्वेत,
चटक हीन, दिव्य, ब्रह्मलीन सा,
एक श्वेत ज्योति पुंज की तरह
जिसमें होते हैं,
सातो रंग,
पराबैगनी से
अवरक्त तक
परन्तु नहीं होती
कोई भी चकाचौंध
बस श्वेताभ अँधेरा।

वस्तुतः आज भी
असमंजस में हूँ की 'हूँ क्या मैं'?


मानव देह में
एक श्लेष्मा की तरह
इस वृहत ब्रह्माण्ड का एक अंश
अथवा
एक उन्नत प्रजाति को
आगे बढ़ाने वाले
एक सूत्र का,
सूत्रांश।

तुलसी

मित्रों यह है मेरी पहली कविता, जो मैंने हेमंत कुकरेती जी के सिल-बट्टा शीर्षक को पढ़ कर लिखी थी। मुझे उस कविता से बड़ी प्रेरणा मिली की हम कविता आपनी रोज-मर्रा की और आस- पास की चीजों पर भी बड़ी आसानी से लिख सकते हैं। इसके पूर्व मैंने सिर्फ़ कहानियाँ ही लिखी थी। कविता के रूप मेरा मेरा यह पहला प्रयास कैसा था ज़रूर लिखें।

मुझे याद है,
पिताजी कहते थे,
"इसकी पत्तियों का सेवन रोग मुक्ति करक है"।

माँ कहती थी,
"इसकी जड़ों में पानी डालना सुख- संपत्ति करक है"।

दादाजी कहते थे,
"इसकी शाखाएं पिरो कर पहनना,
इश्वर प्राप्ति का कारक है"।

आज इस घने अथाह झाड़ को
देखकर, इस पोसोपेश में हूँ,
"आख़िर सफाई के लिए इसके किस अंग को छाटूं,

जो की मेरे लिए आकारक है।"

अपरिमित

मित्रों मेरी आगली कविता थोडी दार्शनिक सी होगी परन्तु मैंने इसे केवल बदलाव हेतु डाला है। यह कविता मेरी उन रचनाओं में से है जिन्हें मैंने मध्य रात्रि के पूर्व लिखा है, अन्यथा मैं साधारणतया मध्य रात्रि अथवा उसके बाद ही लिखने बैठता हूँ।
आशा है आपको अच्छी लगे। आपके प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।


निशांत में अशांत सा,
दिवस में भी है क्लांत सा,
प्रतिकार से अक्रांत,
वियोग से डरा हुआ,
है प्राण पर मारा हुआ,
पाद्हीन खड़ा हुआ,
लक्ष्य हीन चल रहा,
शीत में है जल रहा,
उड़ जाने को मचल रहा,
यह पखेरू प्राण मेरा,
बिद्ध हो ज्यों भीष्म सा,
पतित किंतु सभ्रांत सा।


अंतर्ज्योति जल रही,
श्वास अभी है चल रही,
इच्छाएं भी मचल रही।


क्षुधा वायस है जीवित अभी,
काक पिपासु, है अतृप्त अभी,
चढा है मोह की गर्दभी।

अलंकार अभी उतरे नहीं,
अहंकार भी गया नहीं
ज्ञात है की आयु शेष नहीं।

परन्तु ज्यों वेदान्त सा,
गतिमान है विभ्रांत सा,
मुखमंडल है कान्त सा,
काम में है रत हृदय,
नित उदित आशा सदय,
येही है मानव चरित अनंत,
अश्रव्य किंतु अश्रांत सा.

अपरिमित